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“कलपना” की उड़ान : जन्मदिन की शुभकामनाएं!

१९६०वी का शतक काफी कठिन था | उस वक़्त काफी महिलाएं पढने-लिखने के हक़ के लिए लड़ रहीं थीं | ऐसे वक़्त में एक भारतीय लडकी थी जो अंतरिक्ष के बुलंदियों को छू रही थी – कल्पना चावला | आइये आज उनके जन्मदिवस के उपलक्ष्य में उनकी कहानी को जानते हैं

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टैगोर बाल-निकेतन, करनाल, हरियाणा में कल्पना जी ने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की | बचपन से ही उन्हें उड़ने का शौक था | एयरप्लेन बनाना उन्हें बेहद पसंद था | कल्पना जब आठवी कक्षा में थीं तब उनमें इंजिनयर बनने की इच्छा जागी |

 

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आगे की शिक्षा उन्होंने ‘वैमानिक अभियान्त्रिकी’ में पंजाब इंजिनियरिंग कॉलेजचंडीगढ़भारत से 1982 में पूरी कर, अभियांत्रिकी स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

 

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इसके पश्चात कल्पना जी १९८२ में अमेरिका चली गईं और १९८४ वैमानिक अभियान्त्रिकी में विज्ञान निष्णात की उपाधि टेक्सास विश्वविद्यालय आर्लिंगटन से प्राप्त की। कल्पना जी ने १९८६ में दूसरी विज्ञान निष्णात की उपाधि पाई और १९८८ में कोलोराडो विश्वविद्यालय बोल्डर से वैमानिक अभियंत्रिकी में विद्या वाचस्पति की उपाधि पाई।

१९८८ के अंत में उन्होंने नासा के एम्स अनुसंधान केंद्र के लिए ओवेर्सेट मेथड्स इंक के उपाध्यक्ष के रूप में काम करना शुरू कियाउन्होंने वहाँ वी/एसटीओएल में सीएफ़डी पर अनुसंधान किया।

 

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अक्टूबर        १९९४ में उनका नासा द्वारा एस्ट्रोनोट बनने के लिए चयन हुआ और उनकी ट्रेनिंग मार्च १९९५ में चालू हो गयी |

 

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उनका पहला अंतरिक्ष मिशन १९ नवम्बर १९९७ को छह अंतरिक्ष यात्री दल के हिस्से के रूप में अंतरिक्ष शटल कोलंबिया की उड़ान एसटीएस-८७ से शुरू हुआ। कल्पना जी अंतरिक्ष में उड़ने वाली प्रथम भारत में जन्मी महिला थीं और अंतरिक्ष में उड़ाने वाली भारतीय मूल की दूसरी व्यक्ति थीं। राकेश शर्मा ने १९८४ में सोवियत अंतरिक्ष यान में एक उड़ान भरी थी।

 

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कल्पना जी अपने पहले मिशन में १.०४ करोड़ मील का सफ़र तय कर के पृथ्वी की २५२ परिक्रमाएँ कीं और अंतरिक्ष में ३६० से अधिक घंटे बिताए।

 

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 १६ जनवरी २००३ को कल्पना जी ने अंततः कोलंबिया पर चढ़ के विनाशरत एसटीएस-१०७ मिशन का आरंभ किया।

 

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अंतरिक्ष पर पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला कल्पना चावला की दूसरी अंतरिक्ष यात्रा ही उनकी अंतिम यात्रा साबित हुई। सभी तरह के अनुसंधान तथा विचार – विमर्श के उपरांत वापसी के समय पृथ्वी के वायुमंडल में अंतरिक्ष यान के प्रवेश के समय जिस तरह की भयंकर घटना घटी वह अब इतिहास की बात हो गई। नासा तथा विश्व के लिये यह एक दर्दनाक घटना थी। १ फ़रवरी २००३ को कोलंबिया अंतरिक्षयान पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करते ही टूटकर बिखर गया।

ये अंतरिक्ष यात्री तो सितारों की दुनिया में विलीन हो गए लेकिन इनके अनुसंधानों का लाभ पूरे विश्व को अवश्य मिलेगा। इस तरह कल्पना चावला के यह शब्द सत्य हो गए,” मैं अंतरिक्ष के लिए ही बनी हूँ। प्रत्येक पल अंतरिक्ष के लिए ही बिताया है और इसी के लिए ही मरूँगी|”

(कलपना चावला)

1962-2003

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